| श्री विष्णु पुराण » अंश 5: पंचम अंश » अध्याय 30: पारिजात-हरण » श्लोक 15 |
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| | | | श्लोक 5.30.15  | अस्वे स्वमिति भावोऽत्र यत्पुंसामुपजायते।
अहं ममेति भावो यत्प्रायेणैवाभिजायते।
संसारमातुर्मायायास्तवैतन्नाथ चेष्टितम्॥ १५॥ | | | | | | अनुवाद | | हे प्रभु! जो अनात्म में आत्म-चेतना है तथा मनुष्य में जो मैं और मेरा का भाव उत्पन्न होता है, वह सब आपकी माया के ही कार्य हैं, जो जगत् की माता हैं ॥15॥ | | | | O Lord! The self-consciousness in the non-self and the feelings of "I and mine" that usually arise in a man are all the activities of your Maya, the mother of the universe. ॥15॥ | | ✨ ai-generated | | |
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