श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 3: भगवान् का आविर्भाव तथा योगमायाद्वारा कंसकी वंचना  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  5.3.27-28 
प्रजहास तथैवोच्चै: कंसं च रुषिताब्रवीत्।
किं मया क्षिप्तया कंस जातो यस्त्वां वधिष्यति॥ २७॥
सर्वस्वभूतो देवानामासीन्मृत्यु: पुरा स ते।
तदेतत्सम्प्रधार्याशु क्रियतां हितमात्मन:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
फिर वे जोर से हँसे और क्रोधित होकर कंस से बोले- 'हे कंस! मुझे नीचे गिराकर तुमने क्या प्रयोजन सिद्ध किया? जो तुम्हें मारेगा, वह तो जन्म ले चुका है; देवताओं के सर्वस्व हरि भी तुम्हारे पूर्वजन्म में [काल-नेमि के रूप में] मृत्यु ही थे। अतः ऐसा जानकर तुम्हें शीघ्र ही अपने हित का उपाय करना चाहिए।'॥ 27-28॥
 
Then he laughed loudly and angrily said to Kansa- 'O Kansa! What purpose did you achieve by throwing me down? The one who will kill you has already taken birth; Hari, the everything of the gods, was also death in your previous birth [in the form of Kaal-nemi]. Therefore, knowing this, you should quickly take measures for your own benefit.'॥ 27-28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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