श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 3: भगवान् का आविर्भाव तथा योगमायाद्वारा कंसकी वंचना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  5.3.13-14 
उपसंहर सर्वात्मन् रूपमेतच्चतुर्भुजम्।
जानातु मावतारं ते कंसोऽयं दितिजन्मज:॥ १३॥
श्रीभगवानुवाच
स्तुतोऽहं यत्त्वया पूर्वं पुत्रार्थिन्या तदद्य ते।
सफलं देवि सञ्जातं जातोऽहं यत्तवोदरात्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान बोले - हे देवी! पूर्वजन्म में तुमने मुझसे (पुत्र रूप में जन्म लेने की) प्रार्थना की थी। आज मैंने तुम्हारे गर्भ से जन्म लिया है - और इस प्रकार तुम्हारी इच्छा पूर्ण हुई है॥ 14॥
 
Sri Bhagavan said - O Devi! In your previous birth you had prayed to me [to be born as a son]. Today I have taken birth from your womb - and thus your wish has been fulfilled.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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