श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 3: भगवान् का आविर्भाव तथा योगमायाद्वारा कंसकी वंचना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.3.10 
वसुदेव उवाच
जातोऽसि देवदेवेश शङ्खचक्रगदाधरम्।
दिव्यरूपमिदं देव प्रसादेनोपसंहर॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वसुदेव जी बोले - हे देवों के स्वामी! यद्यपि आप साक्षात् प्रकट हुए हैं, तथापि हे प्रभु! मुझ पर कृपा कीजिए और अब शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले अपने इस दिव्य रूप का समापन कीजिए॥ 10॥
 
Vasudev Ji said - O Lord of all the Gods! Although you [God] have appeared in person, yet O Lord! Kindly do me a favour and now conclude this divine form of yours holding conch-wheel-mace.॥ 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)