श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 23: द्वारका-दुर्गकी रचना, कालयवनका भस्म होना तथा मुचुकुन्दकृत भगवत्स्तुति  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  5.23.46 
अहमत्यन्तविषयी मोहितस्तव मायया।
ममत्वगर्वगर्त्तान्तर्भ्रमामि परमेश्वर॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
हे परमेश्वर! मैं अत्यंत विषयासक्त हूँ और आपकी माया से मोहित होकर आत्म-अभिमान के गर्त में भटक रहा हूँ ॥ 46॥
 
O Supreme Lord, I am extremely sensual and, deluded by your illusion, I have been wandering in the pit of self-pride. ॥ 46॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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