श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 23: द्वारका-दुर्गकी रचना, कालयवनका भस्म होना तथा मुचुकुन्दकृत भगवत्स्तुति  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  5.23.39 
दु:खान्येव सुखानीति मृगतृष्णा जलाशया।
मया नाथ गृहीतानि तानि तापाय मेऽभवन्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! जल की आशा में मृगतृष्णा के समान मैंने दुःख को सुख मान लिया; किन्तु वे मेरे संताप का कारण बन गए। 39.
 
O Lord! Like a mirage in the hope of water, I accepted sorrows as happiness; but they became the cause of my anguish. 39.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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