vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री विष्णु पुराण
»
अंश 5: पंचम अंश
»
अध्याय 23: द्वारका-दुर्गकी रचना, कालयवनका भस्म होना तथा मुचुकुन्दकृत भगवत्स्तुति
»
श्लोक 39
श्लोक
5.23.39
दु:खान्येव सुखानीति मृगतृष्णा जलाशया।
मया नाथ गृहीतानि तानि तापाय मेऽभवन्॥ ३९॥
अनुवाद
हे प्रभु! जल की आशा में मृगतृष्णा के समान मैंने दुःख को सुख मान लिया; किन्तु वे मेरे संताप का कारण बन गए। 39.
O Lord! Like a mirage in the hope of water, I accepted sorrows as happiness; but they became the cause of my anguish. 39.
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas