श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 23: द्वारका-दुर्गकी रचना, कालयवनका भस्म होना तथा मुचुकुन्दकृत भगवत्स्तुति  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  5.23.34 
शब्दादिहीनमजरममेयं क्षयवर्जितम्।
अवृद्धिनाशं तद‍्ब्रह्म त्वमाद्यन्तविवर्जितम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जो ब्रह्म शब्दरहित, अजर, अपरिमेय, अक्षय तथा नाश और वृद्धि से रहित है, वह सनातन और अनंत ब्रह्म आप ही हैं ॥ 34॥
 
That Brahman who is devoid of sounds, ageless, immeasurable, inexhaustible and free from destruction and growth, that eternal and endless Brahman is You alone. ॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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