श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 23: द्वारका-दुर्गकी रचना, कालयवनका भस्म होना तथा मुचुकुन्दकृत भगवत्स्तुति  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.23.33 
बुद्धिरव्याकृतप्राणा: प्राणेशस्त्वं तथा पुमान्।
पुंस: परतरं यच्च व्याप्यजन्मविकारवत्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
आप ही बुद्धि, अजन्मा, प्राण और प्राणों के अधिष्ठाता देवता हैं; तथा आप ही वह तत्त्व भी हैं जो मनुष्य से परे है तथा जन्म और परिवर्तन से रहित है ॥ 33॥
 
You are the intellect, the uncreated, the life force and the presiding deity of the life forces; and you are also the element that is beyond the human being and is devoid of birth and transformation. ॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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