श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 23: द्वारका-दुर्गकी रचना, कालयवनका भस्म होना तथा मुचुकुन्दकृत भगवत्स्तुति  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  5.23.32 
त्वं पयोनिधयश्शैलसरितस्त्वं वनानि च।
मेदिनी गगनं वायुरापोऽग्निस्त्वं तथा मन:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
तुम ही समुद्र हो, तुम ही पर्वत हो, तुम ही नदियाँ हो, तुम ही वन हो और तुम ही पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि और मन हो ॥32॥
 
You are the ocean, you are the mountains, you are the rivers, you are the forests and you are the earth, sky, air, water, fire and mind. ॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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