vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री विष्णु पुराण
»
अंश 5: पंचम अंश
»
अध्याय 23: द्वारका-दुर्गकी रचना, कालयवनका भस्म होना तथा मुचुकुन्दकृत भगवत्स्तुति
»
श्लोक 3
श्लोक
5.23.3
आराधयन्महादेवं लोहचूर्णमभक्षयत्।
ददौ वरं च तुष्टोऽस्मै वर्षे तु द्वादशे हर:॥ ३॥
अनुवाद
श्री महादेवजी की आराधना करते हुए उसने केवल लौह चूर्ण खाया, तब बारहवें वर्ष भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर उसे मनोवांछित वर दिया॥3॥
While worshiping Shri Mahadevji, he ate only iron powder, then in the twelfth year, Lord Shankar became pleased and gave him the desired boon. 3॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas