श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 23: द्वारका-दुर्गकी रचना, कालयवनका भस्म होना तथा मुचुकुन्दकृत भगवत्स्तुति  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  5.23.25-26 
मुचुकुन्दोऽपि तत्रासौ वृद्धगार्ग्यवचोऽस्मरत्॥ २५॥
संस्मृत्य प्रणिपत्यैनं सर्वं सर्वेश्वरं हरिम्।
प्राह ज्ञातो भवान‍‍‍्विष्णोरंशस्त्वं परमेश्वर॥ २६॥
 
 
अनुवाद
तब मुचुकुन्द को वृद्ध ऋषि गार्ग्य के वचन स्मरण हो आये। स्मरण होते ही उन्होंने परब्रह्म भगवान श्रीहरि को प्रणाम किया और कहा - "हे भगवन्! मैंने आपको जान लिया है; आप साक्षात् भगवान विष्णु के अंश हैं।" 25-26॥
 
Then Muchukunda remembered the words of old sage Gargya. As soon as he remembered him, he paid obeisance to the Supreme Lord Sri Hari and said – “Oh God! I have known you; You are actually a part of Lord Vishnu. 25-26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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