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श्लोक 5.23.1  |
श्रीपराशर उवाच
गार्ग्यं गोष्ठॺां द्विजं श्यालष्षण्ढ इत्युक्तवान्द्विज।
यदूनां सन्निधौ सर्वे जहसुर्यादवास्तदा॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| श्री पराशर जी बोले - हे ब्राह्मण! एक बार यादवों की एक सभा में महर्षि गार्ग्य के साले ने उन्हें नपुंसक कहा। उस समय सभी यादव हँसने लगे। |
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| Shri Parashar Ji said- O Brahmin! Once in a gathering of Yadavas, Maharishi Gargya's brother-in-law called him impotent. At that time all the Yadavas started laughing. |
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