श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 23: द्वारका-दुर्गकी रचना, कालयवनका भस्म होना तथा मुचुकुन्दकृत भगवत्स्तुति  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.23.1 
श्रीपराशर उवाच
गार्ग्यं गोष्ठॺां द्विजं श्यालष्षण्ढ इत्युक्तवान्द्विज।
यदूनां सन्निधौ सर्वे जहसुर्यादवास्तदा॥ १॥
 
 
अनुवाद
श्री पराशर जी बोले - हे ब्राह्मण! एक बार यादवों की एक सभा में महर्षि गार्ग्य के साले ने उन्हें नपुंसक कहा। उस समय सभी यादव हँसने लगे।
 
Shri Parashar Ji said- O Brahmin! Once in a gathering of Yadavas, Maharishi Gargya's brother-in-law called him impotent. At that time all the Yadavas started laughing.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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