vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री विष्णु पुराण
»
अंश 5: पंचम अंश
»
अध्याय 22: जरासन्धकी पराजय
»
श्लोक 18
श्लोक
5.22.18
मनुष्यदेहिनां चेष्टामित्येवमनुवर्तते।
लीला जगत्पतेस्तस्यच्छन्दत: परिवर्तते॥ १८॥
अनुवाद
इस प्रकार मनुष्यरूपधारी मनुष्यों के कर्मों का अनुसरण करते हुए जगत् के स्वामी भगवान् की दिव्य लीलाएँ उनकी इच्छानुसार होती रहीं ॥18॥
In this manner, following the actions of those in human form, the divine plays of the Lord of the world kept taking place according to His will. ॥18॥
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे द्वाविंशोऽध्याय:॥ २२॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×