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श्लोक 5.21.14  |
गच्छेदं ब्रूहि वायो त्वमलं गर्वेण वासव।
दीयतामुग्रसेनाय सुधर्मा भवता सभा॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| "हे वायु! तुम जाकर इन्द्र से कहो कि हे वासव! तुम अपना व्यर्थ अभिमान त्यागकर उग्रसेन को सुधर्मा नामक अपनी सभा दे दो। 14. |
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| "O Vaio! You go and tell Indra that O Vasava! Giving up your useless pride, you give Ugrasena your assembly named Sudharma. 14. |
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