श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 21: उग्रसेनका राज्याभिषेक तथा भगवान् का विद्याध्ययन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.21.12 
ययातिशापाद्वंशोऽयमराज्यार्होऽपि साम्प्रतम्।
मयि भृत्ये स्थिते देवानाज्ञापयतु किं नृपै:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि ययाति के शाप के कारण हमारा वंश राजसिंहासन का अधिकारी नहीं है, तथापि इस समय जब तक मैं आपका सेवक हूँ, तब तक आप राजाओं को ही नहीं, देवताओं को भी आज्ञा दे सकते हैं। ॥12॥
 
Although our dynasty is not entitled to the throne due to the curse of Yayatiti, yet at present, as long as I am your servant, you can order not only kings but even gods." ॥12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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