श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 21: उग्रसेनका राज्याभिषेक तथा भगवान् का विद्याध्ययन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.21.11 
कृतौद‍‍्र्ध्वदैहिकं चैनं सिंहासनगतं हरि:।
उवाचाज्ञापय विभो यत्कार्यमविशङ्कित:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
श्रीहरि ने अर्ध-शारीरिक कार्यों से निवृत्त होकर सिंहासन पर बैठे हुए उग्रसेन से कहा - "हे विभो! जो भी सेवा हमारे योग्य हो, उसे करने के लिए हमें बिना किसी संकोच के अनुमति दीजिए ॥11॥
 
After retiring from semi-physical activities, Shri Hari spoke to Ugrasen who was seated on the throne – “O Vibho! Give us permission without any hesitation to do whatever service is worthy of us. 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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