श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 20: कुब्जापर कृपा, धनुर्भंग, कुवलयापीड और चाणूरादि मल्लोंका नाश तथा कंस-वध  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  5.20.33-34 
हाहाकारो महाञ्जज्ञे रङ्गमध्ये द्विजोत्तम।
बलदेवोऽनुजं दृष्ट्वा वचनं चेदमब्रवीत्॥ ३३॥
हन्तव्यो हि महाभाग नागोऽयं शत्रुचोदित:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
हे द्विजश्रेष्ठ! उस समय रंगशाला में बड़ा कोलाहल मच गया और बलदेवजी अपने छोटे भाई कृष्ण की ओर देखकर बोले - "हे महाभाग! इस हाथी को शत्रु ने प्रेरित किया है; अतः इसे मार डालना चाहिए ॥33-34॥
 
O best of the two! At that time there was a great uproar in the theater and Baldevji looked towards his younger brother Krishna and said – “O Mahabhag! The enemy has inspired this elephant; Therefore he should be killed. 33-34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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