श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 20: कुब्जापर कृपा, धनुर्भंग, कुवलयापीड और चाणूरादि मल्लोंका नाश तथा कंस-वध  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  5.20.105 
कर्माणि रुद्रमरुदश्विशतक्रतूनां
साध्यानि यस्य न भवन्ति निरीक्षितानि।
त्वं विष्णुरीश जगतामुपकारहेतो:
प्राप्तोऽसि न: परिगतो विगतो हि मोह:॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
अब तक मैंने आपके अनेक ऐसे कर्म देखे हैं जो रुद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार और इन्द्र की पहुँच से भी परे हैं। अब मेरा मोह दूर हो गया है। हे प्रभु! [मैंने निश्चयपूर्वक जान लिया है कि] आप स्वयं भगवान विष्णु हैं जो जगत के कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं॥105॥
 
Till now I have seen many such deeds of yours which are beyond the reach of even Rudra, Marudgan, Ashwinikumar and Indra. Now my delusion has been dispelled. O Lord! [I have definitely known that] you are the Lord Vishnu himself who has appeared for the benefit of the world.॥ 105॥
 
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे विंशोऽध्याय:॥ २०॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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