श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 18: भगवान् का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  5.18.53 
न यत्र नाथ विद्यन्ते नामजात्यादिकल्पना:।
तद‍्ब्रह्म परमं नित्यमविकारि भवानज:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
हे नाथ! जहाँ नाम, जाति आदि का सर्वथा अभाव है, वहाँ आप ही सनातन अविकारी और अजन्मा परब्रह्म हैं॥ 53॥
 
O Nath! Where there is total absence of concepts like name, caste etc., you are that eternally unchangeable and unborn Supreme Brahma. ॥ 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)