श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 18: भगवान् का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  5.18.37 
वृतं वासुकिरम्भाद्यैर्महद्भि: पवनाशिभि:।
संस्तूयमानमुद‍्गन्धिवनमालाविभूषितम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
वे वासुकि और रम्भ जैसे महान् नागों से घिरे हुए हैं और उनके द्वारा स्तुति किए जा रहे हैं तथा अत्यंत सुगन्धित पुष्पों की मालाओं से सुशोभित हैं ॥37॥
 
He is surrounded by great snakes like Vasuki and Rambha and is being praised by them and is adorned with garlands of very fragrant flowers. 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)