श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 18: भगवान् का मथुराको प्रस्थान, गोपियोंकी विरह-कथा और अक्रूरजीका मोह  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.18.2 
सोऽप्येनं ध्वजवज्राब्जकृतचिह्नेन पाणिना।
संस्पृश्याकृष्य च प्रीत्या सुगाढं परिषस्वजे॥ २॥
 
 
अनुवाद
भगवान् ने भी अपने ध्वज, वज्र और कमलजटित हाथों से उसका स्पर्श किया और प्रेमपूर्वक उसे अपनी ओर खींचकर कसकर गले लगा लिया॥ 2॥
 
The Lord also touched him with His flag, thunderbolt and lotus-studded hands and lovingly pulled him towards Himself and embraced him tightly.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)