श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 17: अक्रूरजीकी गोकुलयात्रा  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.17.4 
पापं हरति यत्पुंसां स्मृतं सङ्कल्पनामयम्।
तत्पुण्डरीकनयनं विष्णोर्द्रक्ष्याम्यहं मुखम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
आज मैं भगवान विष्णु के उसी कमल-नेत्र मुख का दर्शन करूँगा, जिसका स्मरण मात्र से मनुष्यों के पाप नष्ट हो जाते हैं॥4॥
 
Today I will look at the same lotus-eyed face of Lord Vishnu whose mere remembrance removes the sins of men. ॥4॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas