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श्लोक 5.17.4  |
पापं हरति यत्पुंसां स्मृतं सङ्कल्पनामयम्।
तत्पुण्डरीकनयनं विष्णोर्द्रक्ष्याम्यहं मुखम्॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| आज मैं भगवान विष्णु के उसी कमल-नेत्र मुख का दर्शन करूँगा, जिसका स्मरण मात्र से मनुष्यों के पाप नष्ट हो जाते हैं॥4॥ |
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| Today I will look at the same lotus-eyed face of Lord Vishnu whose mere remembrance removes the sins of men. ॥4॥ |
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