श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 17: अक्रूरजीकी गोकुलयात्रा  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.17.33 
तस्मादहं भक्तिविनम्रचेता
व्रजामि सर्वेश्वरमीश्वराणाम्।
अंशावतारं पुरुषोत्तमस्य
ह्यनादिमध्यान्तमजस्य विष्णो:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
अतः मैं उन देवताओं के भी देव, आदि, मध्य और अंतर्यामी भगवान विष्णु के अंशावतार श्री कृष्णचन्द्र के पास भक्तियुक्त विनम्र मन से जाता हूँ। [मुझे पूर्ण आशा है कि वे कभी मेरी अवज्ञा नहीं करेंगे]॥33॥
 
Therefore, I go to Shri Krishna Chandra, the part-incarnation of Lord Vishnu, the God of those Gods, the first, the middle and the innermost Supreme Being, with a humble mind of devotion. [I have full hope that they will never disobey me]॥ 33॥
 
इति श्रीविष्णुपुराणे पञ्चमेंऽशे सप्तदशोऽध्याय:॥ १७॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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