श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 17: अक्रूरजीकी गोकुलयात्रा  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  5.17.32 
ज्ञानात्मकस्यामलसत्त्वराशे-
रपेतदोषस्य सदा स्फुटस्य।
किं वा जगत्यत्र समस्तपुंसा-
मज्ञातमस्यास्ति हृदि स्थितस्य॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
अथवा संसार में ऐसी कौन सी बात है जो ज्ञानस्वरूप, शुद्ध, निर्दोष, सनातन ज्योतिस्वरूप और समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित भगवान को ज्ञात नहीं है? 32॥
 
Or what is there in the world that is not known to the Lord who is the embodiment of knowledge, pure, flawless, eternal light and situated in the heart of all beings? 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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