श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 17: अक्रूरजीकी गोकुलयात्रा  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  5.17.28 
अप्येष पृष्ठे मम हस्तपद्मं
करिष्यति श्रीमदनन्तमूर्ति:।
यस्याङ्गुलिस्पर्शहताखिलाघै-
रवाप्यते सिद्धिरपास्तदोषा॥ २८॥
 
 
अनुवाद
क्या भगवान हरि के सनातन स्वरूप, जिनकी अंगुली लोगों को सभी पापों से मुक्त कर देती है और कैवल्य मोक्ष प्रदान करती है, मेरी पीठ पर अपना कमल रखेंगे? 28॥
 
Will the eternal embodiment of Lord Hari, whose finger frees people from all sins and attains Kaivalya Moksha, place his lotus on my back? 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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