श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 17: अक्रूरजीकी गोकुलयात्रा  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  5.17.27 
साफल्यमक्ष्णोर्युगमेतदत्र
दृष्टे जगद्धातरि यातमुच्चै:।
अप्यङ्गमेतद्भगवत्प्रसादा-
त्तदङ्गसङ्गे फलवन्मम स्यात्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
इस जगद्विधाता का दर्शन पाकर आज मेरे नेत्र सफल हो गए; परंतु अब भगवान की कृपा से क्या मेरा शरीर भी उनका शरीर पाकर धन्य हो सकेगा? 27॥
 
After getting the darshan of this Jagadvidhata, today my pair of eyes became successful; But now, by the grace of God, will my body also be able to be blessed by getting his body? 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)