श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 17: अक्रूरजीकी गोकुलयात्रा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.17.2 
चिन्तयामास चाक्रूरो नास्ति धन्यतरो मया।
योऽहमंशावतीर्णस्य मुखं द्रक्ष्यामि चक्रिण:॥ २॥
 
 
अनुवाद
अक्रूरजी सोचने लगे, 'आज मेरे समान सौभाग्यशाली कोई नहीं है, क्योंकि मैं अपने ही अंश से अवतरित चक्रधारी श्रीविष्णु भगवान् का मुख अपनी आँखों से देखूँगा॥ 2॥
 
Akrurji began to think, 'Today there is no one as fortunate as me, because I will see with my own eyes the face of the Chakradhari Sri Vishnu Bhagwan who has incarnated from my own part.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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