श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 17: अक्रूरजीकी गोकुलयात्रा  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  5.17.11 
साम्प्रतं च जगत्स्वामी कार्यमात्महृदि स्थितम्।
कर्तुं मनुष्यतां प्राप्तस्स्वेच्छादेहधृगव्यय:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
इस समय जगत् का अविनाशी आत्मा अपनी इच्छा से अपने मन में सोचे हुए कार्य को करने के लिए मनुष्य रूप धारण कर चुका है ॥11॥
 
‘At this time, the imperishable soul of the universe has, by his own will, taken on a human form to carry out the work that he had planned in his mind. ॥ 11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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