श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 13: गोपोंद्वारा भगवान् का प्रभाववर्णन तथा भगवान् का गोपियोंके साथ रासक्रीडा करना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  5.13.30 
एवं नानाप्रकारासु कृष्णचेष्टासु तास्तदा।
गोप्यो व्यग्रा: समं चेरू रम्यं वृन्दावनान्तरम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार श्री कृष्णचन्द्र के नाना प्रकार के कार्यों में मग्न होकर वे सब गोपियाँ अत्यंत मनोरम वृन्दावन के भीतर एक साथ विहार करने लगीं॥30॥
 
In this way, all the Gopis, engrossed in the various activities of Shri Krishnachandra, started wandering together inside the very picturesque Vrindavan. 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)