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श्लोक 5.13.18  |
शनैश्शनैर्जगौ गोपी काचित्तस्य लयानुगम्।
दत्तावधाना काचिच्च तमेव मनसास्मरत्॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| वहाँ पहुँचकर कुछ गोपियाँ उनके साथ धीरे-धीरे गाने लगीं और कुछ मन ही मन उनका स्मरण करने लगीं॥18॥ |
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| Upon reaching there some Gopis began to softly sing along with him while some others began to remember him in their hearts.॥ 18॥ |
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