श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 13: गोपोंद्वारा भगवान् का प्रभाववर्णन तथा भगवान् का गोपियोंके साथ रासक्रीडा करना  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  5.13.14-15 
कृष्णस्तु विमलं व्योम शरच्चन्द्रस्य चन्द्रिकाम्।
तदा कुमुदिनीं फुल्लामामोदितदिगन्तराम्॥ १४॥
वनराजिं तथा कूजद‍‍्भृङ्गमालामनोहराम्।
विलोक्य सह गोपीभिर्मनश्चक्रे रतिं प्रति॥ १५॥
 
 
अनुवाद
तब श्रीकृष्णचन्द्र ने निर्मल आकाश, शरच्चन्द्र का चन्द्रमा, दिशाओं को सुगन्धित करने वाली खिली हुई कुमुदिनी तथा मधुर स्वरों से शोभायमान वन को देखकर गोपियों के साथ रमण करने की इच्छा की ॥14-15॥
 
Then Shri Krishnachandra, seeing the clear sky, the moon of Sharachchandra, the blooming lilies that make the directions fragrant and the forest glades beautiful with the vocal honeyeaters, wished to enjoy with the Gopis. 14-15॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd