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श्लोक 5.11.18  |
सुनिवातेषु देशेषु यथा जोषमिहास्यताम्।
प्रविश्यतां न भेतव्यं गिरिपाताच्च निर्भयै:॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| यहाँ आकर इस वायुरहित स्थान में सुखपूर्वक बैठो; निर्भय होकर प्रवेश करो; पर्वत आदि के गिरने का भय मत करो।॥18॥ |
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| Come here and sit comfortably in this airless place; enter without fear; do not be afraid of the mountain falling etc.''॥ 18॥ |
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