न द्वारबन्धावरणा न गृहक्षेत्रिणस्तथा।
सुखिनस्त्वखिले लोके यथा वै चक्रचारिण:॥ ३३॥
अनुवाद
हम न तो द्वार-दीवारों में रहने वाले हैं, न ही हम पक्के मकान या खेत वाले किसान हैं, अपितु वन-पर्वतों में स्वतन्त्र विचरण करने वाले ऋषियों के समान सम्पूर्ण मनुष्यों के साथ रहने में सुखी हैं (इसलिए गृहस्थ कृषकों के समान हमें इन्द्र की पूजा करने की आवश्यकता नहीं है)॥33॥
We are neither those who live within doors and walls, nor are we farmers who have fixed houses or fields, but like the sages who roam freely in the forests and mountains, we are happy in the company of all the human beings [therefore, we have no need to worship Indra like the householder farmers].”॥ 33॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥