श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 1: वसुदेव-देवकीका विवाह, भारपीडिता पृथिवीका देवताओंके सहित क्षीरसमुद्रपर जाना और भगवान् का प्रकट होकर उसे धैर्य बँधाना, कृष्णावतारका उपक्रम  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  5.1.48 
अन्यूनश्चाप्यवृद्धिश्च स्वाधीनो नादिमान्वशी।
क्लमतन्द्राभयक्रोधकामादिभिरसंयुत:॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
आप वृद्धि-क्षीणता से रहित, स्वतन्त्र, सनातन और इन्द्रियों को वश में रखने वाले हैं। आप थकान, तन्द्रा, भय, क्रोध, काम आदि से रहित हैं ॥48॥
 
You are free from any increase or decrease, are independent, eternal and have controlled the senses. You are without fatigue, drowsiness, fear, anger, lust etc. ॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)