श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 1: वसुदेव-देवकीका विवाह, भारपीडिता पृथिवीका देवताओंके सहित क्षीरसमुद्रपर जाना और भगवान् का प्रकट होकर उसे धैर्य बँधाना, कृष्णावतारका उपक्रम  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  5.1.46 
एकं त्वमग्रॺं परमं पदं य-
त्पश्यन्ति त्वां सूरयो ज्ञानदृश्यम्।
त्वत्तो नान्यत्किञ्चिदस्ति स्वरूपं
यद्वा भूतं यच्च भव्यं परात्मन्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
एकमात्र परम परम पद आप ही हैं। ज्ञानी पुरुष आपको ही देखते हैं, जिन्हें ज्ञानरूपी दृष्टि से देखा जा सकता है। हे परमात्मा! भूत और भविष्य जो कुछ है, वह आपसे भिन्न नहीं है। ॥46॥
 
The only supreme supreme position is You. The wise men see You only, who can be seen with the sight of knowledge. O Supreme Soul! Whatever is the past and future is nothing other than You. ॥ 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)