श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 1: वसुदेव-देवकीका विवाह, भारपीडिता पृथिवीका देवताओंके सहित क्षीरसमुद्रपर जाना और भगवान् का प्रकट होकर उसे धैर्य बँधाना, कृष्णावतारका उपक्रम  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  5.1.42 
अणोरणीयांसमसत्स्वरूपं
त्वां पश्यतोऽज्ञाननिवृत्तिरग्रॺा।
धीरस्य धीरस्य बिभर्त्ति नान्य-
द्वरेण्यरूपात्परत: परात्मन्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
हे भगवन्! जिस धीर पुरुष की बुद्धि आपके उत्तम स्वरूप के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु को नहीं देखती, वह आपके परमाणुओं और दृश्य रूपों को भी देख लेने वाला पुरुष अज्ञान से सर्वथा मुक्त हो जाता है। 42॥
 
Oh God! The patient person whose intellect does not see anything other than your best form, the person who sees even your atoms and visible forms becomes completely free from ignorance. 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)