श्री विष्णु पुराण  »  अंश 5: पंचम अंश  »  अध्याय 1: वसुदेव-देवकीका विवाह, भारपीडिता पृथिवीका देवताओंके सहित क्षीरसमुद्रपर जाना और भगवान् का प्रकट होकर उसे धैर्य बँधाना, कृष्णावतारका उपक्रम  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  5.1.40 
त्वमव्यक्तमनिर्देश्यमचिन्त्यानामवर्णवत्।
अपाणिपादरूपं च शुद्धं नित्यं परात्परम्॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
आप अव्यक्त, अवर्णनीय, अचिन्त्य, नाम-रंग से रहित, अंग-रूप से रहित, शुद्ध, सनातन और सबसे परे हैं ॥40॥
 
You are unmanifested, indescribable, inconceivable, devoid of name or colour, devoid of limbs and form, pure, eternal and beyond even the farthest. ॥ 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)