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श्लोक 4.9.23  |
| एतदिन्द्रस्य स्वपदच्यवनादारोहणं श्रुत्वा पुरुष: स्वपदभ्रंशं दौरात्म्यं च नाप्नोति॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| इन्द्र के आसन से गिरकर फिर ऊपर चढ़ने की कथा सुनने से मनुष्य आसन से नहीं गिरता और उसके शरीर में कभी बुराई प्रवेश नहीं करती ॥23॥ |
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| By listening to the story of Indra falling from his seat and then climbing up again, a man does not fall from his seat and evil never enters his body. ॥23॥ |
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