श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 7: जह्नुका गंगापान तथा जमदग्नि और विश्वामित्रकी उत्पत्ति  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  4.7.30 
भगवन्मयैतदज्ञानादनुष्ठितं प्रसादं मे कुरु मैवंविध: पुत्रो भवतु काममेवंविध: पौत्रो भवत्वित्युक्ते मुनिरप्याह॥ ३०॥ एवमस्त्विति॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
"प्रभो! मुझसे अनजाने में ही यह काम हुआ है, अतः आप प्रसन्न होकर ऐसा कुछ कीजिए जिससे मेरा पुत्र ऐसा न हो, चाहे मेरा पोता ऐसा ही क्यों न हो जाए!" इस पर ऋषि ने कहा - 'ऐसा ही हो।'॥30-31॥
 
"Lord! I have done this unknowingly, so please be pleased and do something so that my son does not become like this, even if my grandson becomes like this!" To this the sage said - 'Let it be so.'॥ 30-31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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