श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 6: सोमवंशका वर्णन; चन्द्रमा, बुध और पुरूरवाका चरित्र  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  4.6.35 
पुरूरवास्त्वतिदानशीलोऽतियज्वातितेजस्वी। यं सत्यवादिनमतिरूपवन्तं मनस्विनं मित्रावरुणशापान्मानुषे लोके मया वस्तव्यमिति कृतमतिरुर्वशी ददर्श॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
पुरुरवा बड़े दानशील, बड़े त्यागी और बड़े तेजस्वी थे। ‘मित्रावरुण के शाप के कारण मुझे मृत्युलोक में रहना पड़ेगा’, ऐसा विचार करते हुए उर्वशी अप्सरा की दृष्टि उस अत्यन्त सत्यवादी, रूपवान और बुद्धिमान राजा पुरुरवा पर पड़ी। 35॥
 
Pururava was very charitable, very sacrificial and very bright. Thinking like this, 'Due to the curse of Mitravaruna, I will have to live in the mortal world', Urvashi Apsara's gaze fell on that very truthful, rich in form and intelligent King Pururva. 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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