श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 2: इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  4.2.89 
भवतीनां जनयिता महाराजस्समाज्ञापयति॥ ८९॥ अयमस्मान् ब्रह्मर्षि: कन्यार्थं समभ्यागत:॥ ९०॥ मया चास्य प्रतिज्ञातं यद्यस्मत्कन्या या काचिद्भगवन्तं वरयति तत्कन्यायाश्छन्दे नाहं परिपन्थानं करिष्यमीत्याकर्ण्य सर्वा एव ता: कन्या: सानुरागा: सप्रमदा: करेणव इवेभयूथपतिं तमृषिमहमहमिकया वरयाम्बभूवुरूचुश्च॥ ९१॥
 
 
अनुवाद
"तुम्हारे पिता महाराज मान्धाता ने आज्ञा दी है कि ये ब्रह्मर्षि हमारे पास कन्या हेतु आये हैं और मैंने इन्हें वचन दिया है कि जो मेरी पुत्री सज्जन पुरुष का वरण करेगी, उसकी स्वतन्त्रता में मैं कोई बाधा नहीं डालूँगा।" यह सुनकर समस्त कन्याओं ने प्रेम और हर्ष के साथ उन्हें वरण किया, जैसे हथिनियाँ हाथियों के राजा का वरण करती हैं। वे आपस में बातें करने लगीं -॥89-91॥
 
"Your father Maharaja Mandhaata has ordered that this Brahmarshi has come to us for a daughter and I have promised him that I will not create any hindrance in the freedom of any daughter of mine who chooses the gentleman." On hearing this, all the daughters chose him with love and joy, like the female elephants who choose the king of elephants. They started talking to each other -॥ 89-91॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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