| श्री विष्णु पुराण » अंश 4: चतुर्थ अंश » अध्याय 2: इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र » श्लोक 132 |
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| | | | श्लोक 4.2.132  | | इत्येतन्मान्धातृदुहितृसम्बन्धादाख्यातम्॥ १३२॥ यश्चैतत्सौभरिचरितमनुस्मरति पठति पाठयति शृणोति श्रावयति धरत्यवधारयति लिखति लेखयति शिक्षयत्यध्यापयत्युपदिशति वा तस्य षड् जन्मानि दुस्सन्ततिरसद्धर्मो वाङ्मनसयोरसन्मार्गाचरणमशेषहेतुषु वा ममत्वं न भवति॥ १३३॥ | | | | | | अनुवाद | | इस प्रकार मैंने मान्धाता की पुत्रियों के विषय में यह कथा कही है। जो कोई इस सौभरिचरित्र का स्मरण करेगा, या पढ़ेगा या पढ़ाएगा, सुनेगा या सुनाएगा, धारण करेगा या पहनाएगा, लिखेगा या लिखवाएगा, सीखेगा या पढ़ाएगा या उपदेश देगा, उसके छह जन्मों तक न तो दुष्ट सन्तान होगी, न बुरे कर्म होंगे, न वाणी और न मन में कुमार्ग की ओर प्रवृत्ति होगी और न किसी पदार्थ में आसक्ति होगी ॥132-133॥ | | | | In this manner I have narrated this story in relation to the daughters of Mandhaata. Whoever remembers this Saubhari-charita, or reads or teaches, listens or narrates, wears or makes others wear it, writes or gets it written, learns or teaches or preaches it, he will not have bad progeny, bad deeds, speech or mind will not have any inclination towards evil ways and will not have attachment to any material thing for six births. ॥132-133॥ | | | | इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेंऽशे द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥ | | | | ✨ ai-generated | | |
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