| श्री विष्णु पुराण » अंश 4: चतुर्थ अंश » अध्याय 2: इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र » श्लोक 130 |
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| | | | श्लोक 4.2.130  | | तत्राप्यनुदिनं वैखानसनिष्पाद्यमशेषक्रियाकलापं निष्पाद्य क्षपितसकलपाप: परिपक्वमनोवृत्तिरात्मन्यग्नीन्समारोप्य भिक्षुरभवत्॥ १३०॥ | | | | | | अनुवाद | | वहाँ वानप्रस्थके योग्य समस्त कर्म करके, सम्पूर्ण पापोंका नाश हो जानेपर तथा राग-द्वेषसे रहित हो जानेपर उसने अपने अन्दर आह्वानि आदि अग्निकी स्थापना की और संन्यासी हो गया ॥130॥ | | | | There, after performing all the activities worthy of a Vanaprastha, after all the sins were destroyed and his mind became free from attachment and hatred, he established the fire of Ahavani etc. within himself and became a Sanyasi. 130॥ | | ✨ ai-generated | | |
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