श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 2: इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र  »  श्लोक 123
 
 
श्लोक  4.2.123 
चीर्णं तपो यत्तु जलाश्रयेण
तस्यर्द्धिरेषा तपसोऽन्तराय:।
मत्स्यस्य सङ्गादभवच्च यो मे
सुतादिरागो मुषितोऽस्मि तेन॥ १२३॥
 
 
अनुवाद
यह धन मेरे उस तप में बाधक है जो मैंने तालाब में रहकर किया था। मत्स्यों के संग से मेरे मन में जो पुत्र आदि की आसक्ति उत्पन्न हुई थी, उसी ने मुझे धोखा दिया है॥123॥
 
This wealth is a hindrance to the penance I did while living in a pond. The attachment for a son etc. that arose in my mind after being in the company of the fish has deceived me.॥123॥
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