श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 2: इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  4.2.120 
स मे समाधिर्जलवासमित्र-
मत्स्यस्य सङ्गात्सहसैव नष्ट:।
परिग्रहस्सङ्गकृतो मयायं
परिग्रहोत्था च ममातिलिप्सा॥ १२०॥
 
 
अनुवाद
हे! जल में मेरी सहचरी मछली के संगसे मेरी वह समाधि अचानक नष्ट हो गई और उसी संगसे मुझे स्त्री और धन आदिकी प्राप्ति हुई और अब इन सम्पत्तियोंके कारण मेरा लोभ बढ़ गया है॥120॥
 
Oh! That trance of mine was suddenly destroyed by the association with the fish, my companion in the water, and because of that association I acquired women and wealth, etc., and because of these possessions my greed has now increased.॥ 120॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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