श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 2: इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  4.2.115 
अहो मेमोहस्यातिविस्तार:॥ ११५॥
 
 
अनुवाद
ओह! मेरा मोह कितना महान है! 115
 
Oh! How great is the extent of my infatuation! 115
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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