श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 2: इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  4.2.107 
किं त्वेकं ममैतद‍्दु:खकारणं यदस्मद‍्गृहान्महर्षिरयम्मद्भर्त्ता न निष्क्रामति ममैव केवलमतिप्रीत्या समीपपरिवर्ती नान्यासामस्मद्भगिनीनाम्॥ १०७॥
 
 
अनुवाद
तथापि मुझे बड़ा दुःख है कि हमारे पति, ये महर्षि, मेरे घर से बाहर नहीं जाते। मुझ पर अत्यधिक प्रेम होने के कारण वे केवल मेरे पास ही रहते हैं, मेरी अन्य बहनों के पास कभी नहीं जाते॥107॥
 
However, I am very sad that our husband, this Maharshi, never goes out of my house. Due to his extreme love for me, he stays only with me and never goes to my other sisters.॥ 107॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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