श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 2: इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र  »  श्लोक 104
 
 
श्लोक  4.2.104 
तातातिरमणीय: प्रासादोऽत्रातिमनोज्ञमुपवनमेते कलवाक्यविहङ्गमाभिरुता: प्रोत्फुल्लपद्माकरजलाशया मनोऽनुकूलभक्ष्यभोज्यानुलेपनवस्त्रभूषणादिभोगो मृदूनि शयनासनानि सर्वसम्पत्समेतं मे गार्हस्थ्यम्॥ १०४॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! यह महल अत्यन्त सुन्दर है, ये उपवन भी अत्यन्त सुन्दर हैं, खिले हुए कमलों से परिपूर्ण इन जलाशयों में जलपक्षी सुन्दर-सुन्दर बोलियाँ बोलते रहते हैं, अन्न, भोजन आदि भोज्य पदार्थ, उबटन आदि नैवेद्य तथा वस्त्र, आभूषण आदि तथा कोमल बिछौना आदि सब मन को सुख देने वाले हैं; इस प्रकार यद्यपि हमारा घर सब प्रकार की सम्पत्तियों से परिपूर्ण है ॥104॥
 
'father! This palace is very beautiful, these sub-forests are also very beautiful, the water birds keep speaking beautiful dialects in these reservoirs full of blooming lotuses, the food items like food, food etc., the offerings like ubtan and clothes, ornaments etc. and the soft bedding etc. are all pleasant to the mind; In this way, although our household is full of all wealth. 104॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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