श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 2: इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन तथा सौभरिचरित्र  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  4.2.102 
प्रविश्य चैकं प्रासादमात्मजां परिष्वज्य कृतासनपरिग्रह: प्रवृद्धस्नेहनयनाम्बुगर्भनयनोऽब्रवीत्॥ १०२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वे एक महल में गए और अपनी पुत्री को स्नेहपूर्वक गले लगाकर आसन पर बैठ गए। फिर प्रेम के कारण नेत्रों में आँसू भरकर उन्होंने कहा - ॥102॥
 
Thereafter he went to a palace, embraced his daughter affectionately and sat down on a seat. Then with tears in his eyes due to increasing love he said - ॥102॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)