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श्लोक 4.15.3  |
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वधर्मभृतां वर।
कौतूहलपरेणैतत्पृष्टो मे वक्तुमर्हसि॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| हे पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ मुनि! यह सुनने की मेरी बड़ी इच्छा है। मैंने बड़ी जिज्ञासावश आपसे यह प्रश्न पूछा है; कृपया इसका स्पष्टीकरण करें।॥3॥ |
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| O great sage among all the virtuous souls! I have a great desire to hear this. I have asked you this question out of great curiosity; please explain it. ॥ 3॥ |
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